Saturday, 15 May 2021

कैसे पूरा करें...

 दूर से ना यूँ मुस्कुराइए
कुछ पहेलियाँ बुझाइए
आइए कि आज आप
हमसे भी नज़रें मिलाइए,

जो कह रहे हैं लोग 
महफिलों में यहाँ
कान में आकर सही
सच तो हमें बताइये,

हम नहीं वाम अंग,
ना ही कोई भगवा रंग
हम तो रहे हैं अनंत से
सिर्फ एक तेरे संग

उस प्रसंग की कसम
आइए अब सनम
गुनगुना के कुछ सही
कोई धुन नई बनाइये

ये अथक सफर ख़त्म
ये बहाने अब नहीं
आप हैं सुदृढ़ता धनी
ये बैसाखियाँ हटाइये

नहीं रहेगी पश्चिमी
कोई हवा साथ में
नहीं रहेगा कोई धनी
करवटों के बाद में

फिर ये नग्न दमडियों
चिलचिलाती धूप में
खोलकर ये अंगरखा
तन ढाँककर दिखाइए

मैं अज्ञानी अबोध सा
भटक रहा यहाँ-वहाँ
कुछ देर पास आइए
दुनियादारी सिखाइये

दूर से ना यूँ मुस्कुराइए
कुछ पहेलियाँ बुझाइए
आइए कि आज आप
हमसे भी नज़रें मिलाइए।

उत्साही

अधूरा परिचय

मैं एक ख़्वाब हूँ,
आँखों पर अधूरा सा,

मैं एक राज़ हूँ,
कानों पर अधूरा सा,

मैं एक बात हूँ,
होठों पर अधूरा सा,

मैं एक साथ हूँ,
हाथों पर अधूरा सा,

कुछ अधूरा रह गया,
कुछ अधूरा हो गया,

हो कुछ भी यहाँ,
मुझमें पूरा हो गया

मैं एक अरदास हूँ,
इबादतों में अधूरी सी

मैं एक प्यास हूँ,
कंठ में अधूरी सी,

मैं एक तस्वीर हूँ,
ज़हन में अधूरी सी,

कुछ अर्थ रह गए,
कुछ अनर्थ रह गए,

जो वक़्त में ना ढले,
वो व्यर्थ रह गए..

मैंने काल के गाल से,
जी के जंजाल से,

कुछ उधार ले लिए,
कुछ उधार दे दिए,

प्रश्न पीढ़ियों के लिए
मैंने चुनवा दिए कहीं
कुछ मेरे अपनेपन से
कुछ मेरे अधूरे मन-से...

उत्साही

Friday, 22 January 2021

नेताजी

 समर अजब-सा छिड़ा हुआ,
थी अग्नि रण में भभकती हुई,
किसी का तेज डगमगा गया,
किसी के होश जब थे उड़ गए,
तब बंगाल की कोख से
एक अजेय वीर ने जन्म लिया,
*जय हिंद* का नारा देकर जिसने,
हिन्दुस्तान को अमर किया,
रहे कहीं भी, किसी भी कोने में,
गर्व था उनको भारतीय होने में,
आज़ाद हिंद फौज का गठन कर,
अंग्रेज़ों को खूब परेशान किया,
ऐसी सेना अमर है इतिहास में,
जिसने इतनी संख्या में बलिदान दिया
खून के बदले आज़ादी देने,
बर्मा में जब ज्ञान दिया,
सब जागे देश की ख़ातिर,
सबने ख़ुद को तैयार किया,
लड़े, आखिरी दम तक वो,
सावरकर ने भी तैलचित्र से,
था नेताजी का मान किया,
जिनकी शहादत आज भी
गुमनाम है युगों से कहीं,
उनका हर क्षण जोश से,
हमने नतमस्तक सम्मान किया।


#उत्साही

Thursday, 28 September 2017

-एक वृद्ध माँ

बस एक छोटी सी कोशिश की है एक वृद्ध (महिला) की पीड़ा को समझाने की... कुछ अनुचित हो तो क्षमा कीजिएगा.. और कोई सुझाव हो तो अवश्य साझा करें... धन्यवाद,,, आपका अभिषेक....


एक वृद्ध माँ

कुछ सक संवत से
इस सक संवत तक
कई नदियाँ मैंने पार करी
मोम का सा पुतला लेकर
जैसे सदियाँ पार करी

अथक हर पग
नभ पर, भू पर
चलती थी स्वयंभू हर पल
रुक रुक बुझता रहा इरादा
पर जलता रहा मन मेरा अविरल

पतझड़ में सावन देखे
अनेकों रूप लुभावन देखे
दुःख देखा, सुख देखा
सौंदर्य का बुझता यौवन देखा
क्षीण होता रहा सुडौल नजरिया मेरा
ज्यों कटते अनेक रूपों के कानन देखे
नहीं रुकी मैं, घनघोर घटा में
जब जब सपने पावन देखे

नयी मृदा है
नयी फसल है
न जाने फिर क्या उलझन है
अपना हिस्सा पूरा करके
न जाने फिर क्यूँ तडपन है
सभी मेरे हैं
सब कुछ मेरा है
ये मिथक घर कर बैठा है
अनजाने में अनजानों से
न जाने ये मोह कैसा है

सबको जानू, पर न पहचानू
जर्जर हो जाते हैं नैना
छूटे मन, छूटे ये तन
अब तो छूटे संसार
बचपन लौटा मेरे मन का
जाने दो उस पार

अब जीना मुश्किल होता है
मेरे कारण जो कोई रोता है

व्यक्ति से वस्तु हो जाता है
उम्र होने पे मनुष्य असमर्थ हो जाता है
भूल जाती हूँ अब तो अपना भी नाम कभी कभी
करने लगती हूँ पोतों जैसा काम कभी कभी

पनघट में वो तो मुझे अधूरा छोड़ गए
ये अड़चन जीवन जीने की पूरा छोड़ गए

चिड़ने लगी हूँ अब अपने ही बेटे से
लड़ने लगी हूँ अब अपनी ही बेटी से
पोतों के खिलोने छुपा लेती हूँ
उनसे उनका समोसा छुड़ा लेती हूँ
खुद रोती हूँ जब मन करता है
नहीं तो सबको रुला देती हूँ

सो लूं ज्यादा जिस दिन
पोती मेरे शोर मचा देती है
“दादी मर गयी”
करके सबको बता देती है

होने लगा है मन चंचल सा
लगने लगा है सब बचपन सा
सब अच्छा लगता है
हर कोई सच्चा लगता है

मुझे थामने सब बढ़ते हैं
मेरी ही अब सब सुनते हैं
मुझे चिढ़ाते मुझे सताते
बात बात पे गले लगाते

सब सफल लगता है प्रयास जीवन का
उन्मुक्त सा हर कार्य यौवन का

वसुंधरा का दामन छोड़
अब अम्बुज ही मुझको भाता है
क्षितिज की किनारों से
मुझे निहार वो भी मुस्कुराता है

कभी कभी भय होता है
कुछ अपूर्ण तो नहीं
कोई ऋण तो नहीं
मेरे जीवन का भार
मुझ संग ही मुक्त हो जाये
मेरे जाने के बाद
कोई प्रेत कोई बात
मेरे अपनों का न सताए

गंगाजल, तुलसी अब सिराहने रखे हैं
सपने भी अब मुझको कम आने लगे हैं
हर अतरे दिन मेरे दर्शन को
दूर दराज से मेरे अपने भी आने लगे हैं

अब बस यही मेरी आशा है
कि पीड़ा न हो, न कोई कष्ट हो
मेरे देह का क्रिया कलाप
अब शांति से नष्ट हो

पन्ने पलटते देख कैलेंडर के
मैं खुद को तैयार करती हूँ
सिसकती धुंधली आँखों से घिसटते हुए
अपने बरबस जीवन से
अपनी मौत का
मैं इंतजार करती हूँ

(अभिषेक)