Saturday, 15 May 2021

उस पार चलें..

पहाड़ों के उस पार चलेंगे,
हम तुम एक बार चलेंगे,

नदियों की अविरल धाराओं में,
ऊँचे घने सीना ताने तरुओं में
इन इमारती मकानों से दूर,
हम तब बेफिक्रे से उन्मुक्त बहेंगे,

पहाड़ों के उस पार चलेंगे,
हम तुम एक बार चलेंगे,

सारी लड़ाइयां, रुसवाईयाँ सभी,
गुस्सा तुम्हारा, ये नखरे मेरे, 
सारी तन्हाइयां, अंगड़ाइयाँ सभी
छोड़कर यहीं इस पार चलेंगे,

पहाड़ों के उस पार चलेंगे,
हम तुम एक बार चलेंगे,

कचरे के सारे चादर यहीं,
गाड़ियों की धुकधुकी भी,
पन्नियों को झुरमुटों से
हम जुदा अबकी बार करेंगे

पहाड़ों के उस पार चलेंगे,
हम तुम एक बार चलेंगे।

उत्साही

राम हो जाना आसान है

कोई संशय नहीं है मन में
बहुत विश्लेषण से यही निष्कर्ष है कि
आसान है
बल्कि, बहुत ज्यादा आसान है

सत्य का चोला ओढ़,
कई आडंबरों का भंडाफोड़ कर देना,

क्षणभंगुर पिपसाओं को छोड़,
क्षितिज तक आशाएँ भर देना,

इतने विपरीत परिस्थितियों में भी
राम हो जाना

क्योंकि राम होने के लिए 
नहीं करना पड़ता कुछ अन्यत्र
बस मर्यादाओं में रहकर,
संयम से निभाने पड़ते हैं कुछ
खास से लगने वाले आम नियम।

फिर भी लगता हो कठिन
अगर राम होना तो
सिर्फ एक ही शर्त है
कि
बाकी लोग भी बिना शर्त के
राम के तत्कालीन पात्र हो जाएं

धूल को विदा कर मन से
आत्मा के दर्पण पर
शुद्ध पटल में सत्य हो जाएं

जो स्वयं लक्षमण नहीं बन सकते 
नहीं कर सकते समर्पण भाई के लिए
अपनी जैविक आवश्यकताओं का
जिनका व्यक्तिगत लोभ अधिक है 
भाई से, भाई के परिवार से
उन्हें राम चाहिए

जो भरत नहीं हो सकते
नहीं हो सकते निश्छल
सारा राजपाठ, सारी संपदा
जिनके लिए भाई के
अथाह प्रेम से बढ़कर हो
उन्हें भी राम चाहिए

जो पल-पल बदलती हैं 
छवि अपने प्रियतम की,
नहीं जहाँ कोई भी
स्थिर भृकुटि किसी मन की
संशय में डूब चुके जो
उन्हें भी राम चाहिए

जो नहीं करते सम्मान स्वाभिमान का 
जो दसरथ-कौशल्या के वात्सल्य के
अथाह गहरे में भी संशय में हैं
उन्हें राम चाहिए

त्याग समर्पण और मर्यादा
लुप्त है जहां
मन मे जहां सबके
मंथरा बिराजी है

जहाँ साजे बेर भी देने में
आज सबरी सकुचाई है

जहाँ मित्रता में ठगा जाना सा
मन में कहीं लगता है

उन सबको बस
सब त्यागने, 
देने स्वयं का बलिदान
तपता हुआ
राम चाहिए

ऐसे राम कलियुग में हर क्षण आत्मदाह कर लेते हैं

#उत्साही

बुझते अरमान

 बुझते हुए उन अरमानों की
मैं सिसकती हुई एक आग हूँ,
जो मर कर भी ना मरे यहाँ,
मैं वो अनंत काल का राग हूँ,
तेरे हिस्से में जो जी रहा है,
वो तेरे ही जीवन का भाग हूँ
बन्द आँखों में संजोए सपनों
के गगनचुंबी आशियानों को
पालकर मुस्कुराता हुआ सा
चाँद का वो तिलिस्मी दाग हूँ,
झरनों से उम्मीदों की जो
उठ रही है रश्मियाँ कहीं
घनघोर तमस के जाल में
उन गहराइयों को नापने
मैं उद्विग्न-सा धुंध को ओढ़ा
झरनों का निर्मल झाग हूँ,
लौ जो हैं आफताब ओढ़े
एक दिए कि भांति विद्यमान
बुझते हुए उन अरमानों की
मैं सिसकती हुई एक आग हूँ।

उत्साही

अधूरी किताब

कुछ अनकहे शब्दों से लिपटी,
मैं एक अधूरी किताब हूँ,
जिसके पन्ने-पन्ने उधड़े पड़े हैं,
ऐसी जिल्द में मैं बेहिसाब हूँ,
कोरे पन्नों में उथला-सा दर्द लिए,
कोटि गुलाबों की खुशबू समेटे,
बंद कई राज़ मुड़े हुए,
आख़री पन्नों में दबाकर बैठी,
मैं धधकते आँसुओं का
हर जागती रात का हिसाब हूँ,
जो ना मित सके कभी,
वो फ़ैसले फासलों के
लेकर भी लाजवाब हूँ,
कुछ अनकहे शब्दों से लिपटी,
मैं एक अधूरी किताब हूँ।

उत्साही

कैसे पूरा करें...

 दूर से ना यूँ मुस्कुराइए
कुछ पहेलियाँ बुझाइए
आइए कि आज आप
हमसे भी नज़रें मिलाइए,

जो कह रहे हैं लोग 
महफिलों में यहाँ
कान में आकर सही
सच तो हमें बताइये,

हम नहीं वाम अंग,
ना ही कोई भगवा रंग
हम तो रहे हैं अनंत से
सिर्फ एक तेरे संग

उस प्रसंग की कसम
आइए अब सनम
गुनगुना के कुछ सही
कोई धुन नई बनाइये

ये अथक सफर ख़त्म
ये बहाने अब नहीं
आप हैं सुदृढ़ता धनी
ये बैसाखियाँ हटाइये

नहीं रहेगी पश्चिमी
कोई हवा साथ में
नहीं रहेगा कोई धनी
करवटों के बाद में

फिर ये नग्न दमडियों
चिलचिलाती धूप में
खोलकर ये अंगरखा
तन ढाँककर दिखाइए

मैं अज्ञानी अबोध सा
भटक रहा यहाँ-वहाँ
कुछ देर पास आइए
दुनियादारी सिखाइये

दूर से ना यूँ मुस्कुराइए
कुछ पहेलियाँ बुझाइए
आइए कि आज आप
हमसे भी नज़रें मिलाइए।

उत्साही

अधूरा परिचय

मैं एक ख़्वाब हूँ,
आँखों पर अधूरा सा,

मैं एक राज़ हूँ,
कानों पर अधूरा सा,

मैं एक बात हूँ,
होठों पर अधूरा सा,

मैं एक साथ हूँ,
हाथों पर अधूरा सा,

कुछ अधूरा रह गया,
कुछ अधूरा हो गया,

हो कुछ भी यहाँ,
मुझमें पूरा हो गया

मैं एक अरदास हूँ,
इबादतों में अधूरी सी

मैं एक प्यास हूँ,
कंठ में अधूरी सी,

मैं एक तस्वीर हूँ,
ज़हन में अधूरी सी,

कुछ अर्थ रह गए,
कुछ अनर्थ रह गए,

जो वक़्त में ना ढले,
वो व्यर्थ रह गए..

मैंने काल के गाल से,
जी के जंजाल से,

कुछ उधार ले लिए,
कुछ उधार दे दिए,

प्रश्न पीढ़ियों के लिए
मैंने चुनवा दिए कहीं
कुछ मेरे अपनेपन से
कुछ मेरे अधूरे मन-से...

उत्साही

Friday, 22 January 2021

नेताजी

 समर अजब-सा छिड़ा हुआ,
थी अग्नि रण में भभकती हुई,
किसी का तेज डगमगा गया,
किसी के होश जब थे उड़ गए,
तब बंगाल की कोख से
एक अजेय वीर ने जन्म लिया,
*जय हिंद* का नारा देकर जिसने,
हिन्दुस्तान को अमर किया,
रहे कहीं भी, किसी भी कोने में,
गर्व था उनको भारतीय होने में,
आज़ाद हिंद फौज का गठन कर,
अंग्रेज़ों को खूब परेशान किया,
ऐसी सेना अमर है इतिहास में,
जिसने इतनी संख्या में बलिदान दिया
खून के बदले आज़ादी देने,
बर्मा में जब ज्ञान दिया,
सब जागे देश की ख़ातिर,
सबने ख़ुद को तैयार किया,
लड़े, आखिरी दम तक वो,
सावरकर ने भी तैलचित्र से,
था नेताजी का मान किया,
जिनकी शहादत आज भी
गुमनाम है युगों से कहीं,
उनका हर क्षण जोश से,
हमने नतमस्तक सम्मान किया।


#उत्साही