Tuesday, 3 May 2016

प्रिय ग्रीष्म


प्रति ग्रीष्म ऋतु ,
आपके आने का संकेत मुझे पिछले माह ही मिल गया था। मगर अपनी व्यस्तताओं के चलते मैं आपके स्वागत की तैयारियाँ नहीं कर सका। क्षमा !!!
अभिनन्दन
वंदन
स्वागत
आपके आने से मुझे बहुत ही प्रसन्नता होती है। मन जैसे प्रफुल्लित हो जाता है। सारे रोमकूप में जैसे नयी सी ऊर्जा का संचार होता है। आपको याद है जब हम छोटे थे और तो आपके आने से हमें कितने सारे लाभ होते थे। पाठशाला का अवकाश हो या फिर प्रियदर्शनी का समय सब कुछ आपसे ही निर्धारित होता था। वो गृहकार्य का बोझ भी आपके आने से हल्का प्रतीत होता था। आपके कारन हमें चश्मे, टोपियां और नए नए गमछे खरीदने का भी मौका मिल जाया करता था।
तब बात और थी
कंचों का दौर, गिल्ली डंडा, छुपनी डीप , बरफ-पानी, चीठा(कौंडि), कैरम, सांप-सीढ़ी जैसे और न जाने कितने खेल आपकी ही सौगात थे। इन सब से भी मन नहीं भरता था तो कुल्फी, आइस गोला, गन्ने का रस, आम का पना, मठा और लस्सी से आपके साथ समय बिताया करते थे।
सबसे बड़ा उपहार जो आप हमें देते थे वो था - ग्राम भ्रमण।।।
अति रमणीय, मनमोहक
वाह गांव जाने के लिए हमें साल भर आपका इंतजार करना पड़ता था। नानी -दादी की नई-नई रेसिपीज़ ट्राई करने मिलती थी। आम के बगीचे में जाकर कच्चे आम की केरियां तोडना और शाहेँ चूस चूस के पूरे कपडे आम से भिगो लेना। पूरी दोपहर बैठकर पापड़ बनवाना तो धीरे से कच्ची लोई टेस्ट करना। और लाइट गोल हो जाये तो अंताक्षरी खेलना और कोई डाँट  दे तो बिजना ढूँढना, न खुद सोना न किसी को सोने देना।
पता है ग्रीष्म जी तब जब आते थे तो आपसे डर नहीं लगता था बल्कि एक बड़ा सा लगाव था आपसे कि आपके कारण इतनी सारी खुशियाँ मिलती हैं।
फिर समय के साथ आपके तेवर ही बदल गए। अब तो आप कभी भी जाते हो तो हम तय ही नहीं कर पाते कुछ। और तो और अब आपसे डरना पड़ता है, कितनी सारी तरल क्रीम लगानी पड़ती हैं क्योंकि आपसे जलन होती है अब आप तो अपने हिसाब से कभी भी आ जाते हो। लेकिन हम अपने हिसाब से कहीं नहीं जा सकते।
न अब आम की कच्ची केरियां मिलती हैं , न ही वो कुल्फी। अब तुम्हारे कारन कोई अंताक्षरी खेलने वाला भी नहीं है।
खैर कोई बात नहीं , आप आये इस बात की ख़ुशी है मुझे। आज हम, वो गाँव की गलियाँ, आम की केरियां और बूढ़ी आँखे आपका इन्तजार करें न करें।
कुछ डोरेमोन मस्तियाँ, 10-12 किलो की बुक्स का होमवर्क और असाइनमेंट, कैंडी क्रश के बहुत सारे लेवल, बहुत सारी शादियों के स्टेज और बहुत सारे लुभावने 3G पैक्स आपका बेसब्री से इंतजार करते हैं।
ग्रीष्म जी अपना ख्याल रखिएगा और थोड़ा कूल रहिएगा वैसे भी आज कल लोगों के बीच में काफी गर्मी है।

आपकी विटामिन D का सबसे बड़ा FAN
अभिषेक

Thursday, 7 April 2016

अब तो मान जाओ............

कल शाम ऑफिस के बाद उसने कहा चलो न आज कहीं चलते हैं- पहले जैसे, मगर मैं भी अपनी ज़िद पर कायम रहा और इशारों में  मना करता रहा। मगर वो भी कहाँ मानने वाली थी। आखिर ये ज़िद करना मैंने उसी से सीखा था। वो लगातार मुझे घूरती रही ठीक उसी तरह जैसे कोई अधरों को शांत करने के लिए मृगमरीचिका को भी यथार्थ मान उसकी तरफ दौड़ता है। 
आखिर में उसकी ज़िद के आगे मैं हार ही गया। अपना काम खत्म करके मैं उसके साथ निकल गया। बहुत लम्बे समय बाद हम इस तरह की वॉक पर निकले थे। लेकिन इस बार हमारे बीच कोई संवाद नहीं थे। मैं उस से नाराज़ जो था। लेकिन उसकी कोई गलती नहीं थी। बस मेरी ज़िद थी उस से दूर रहने की। 
आज मैं उसे सुन रहा था, उसकी आँखों में  अजीब सी बेचैनी को महसूस किया मैंने। कभी वो मेरे हाथ को थामती, कभी लड़ने लगती मगर मैं निढाल सा संवेदना रहित उसको सुनता रहा। कभी खीझ में उसका हाथ झटक देता तो कभी आँख दिखाकर उसे शांत रहने को कहता। 
मगर वो भी मुझसे भलीभांति परिचित होने के कारण बस मुस्कुरा देती। 
हम चलते चलते मन्दाकिनी के पास पहुंचे, जहाँ उसने बहते हुए अविरल जल के साथ अटखेलिया शुरू कर दी और मेरे जल-प्रेम को आमंत्रित लगी। 
मगर मैं भी ठीठ, प्रतिक्रिया हीन ही व्यवहार करता रहा। 
कभी वो घर लौटती चिरैय्या की मधुर तान देती, तो कभी डूबते सूरज की लालिमा को वृक्षों से छानकर मुझे छू रही उसकी शीतलता का बखान करती। 
फिर भी मुझे शांत देख आँखों में आंसू लिए बस इतना कहती - अब तो मान जाओ..........
और मैं अपनी ज़िद को प्राथमिकता देते हुए मुंह फेर लेता। 
उसकी आँखों में कई बार मैंने आद्रता को महसूस तो किया, मगर उसने बहुत ही प्यार से मेरे नयनो को अपनी निष्कपट मुसकान की ओर प्रेषित कर लिया। 
क्योंकि मैं जानता हूँ की वही तो मेरी ताकत है, मेरे साहस का, सकारात्मकता की ऊर्जा का स्त्रोत है।  फिर उसे भी पता है कि  नेत्र-जल मेरी कमजोरी हैं और  ज़िद को अपने प्रेम से तोडना चाहती थी कमजोर करके नहीं। 
उसकी इस द्रव्यता से मैं परिचित था इसलिए मैं क्षण भर के लिए भी द्रवित नहीं हुआ। उसने चाँद को अम्बर पर चलते हुए देखकर चाँद की खूबसूरती, उसकी शीतलता और उसके अभिन्न स्वरुप का बखान करना शुरू किया कि शायद वो मेरे दम्भ को जलन से डिगा सके। उसकी कपकपाती होठों के पीछे के दर्द से अभी भी बस वो यही कह रही थी-अब तो मान जाओ..........
मगर मैं अब भी शांत था। अब मेंढकों की, झींगुरों की, बहती हुयी हवा की, गिरते हुए निर्मल जल की और बढ़ती हुयी काली रात की धीमी धीमी मीठी आवाज़ को वो मुझ तक दुहाई दे दे कर मनाने की कोसिस कर रही थी। अपनी खुली हुयी लटाओं से भी वो वृक्ष की लताओं का तुलनात्मक गुणगान कर रही थी। आखिर में वो हार मानते हुए बोली - तुम्हे कुछ नहीं कहना तो मत कहो मगर मुस्कुरा तो दो, फिर पक्का तंग नहीं करुँगी। 
मगर मेरे नेत्रो की दृढ़ता और मेरे ह्रदय की अस्थिरता मैंने उस पर बिलकुल न हावी होने दी और वापस चलने का इशारा करते हुए नदी से पैर निकालकर उठ खड़ा हो गया। 
वो भी और परेशान न करते हुए मेरे हाथ का सहारा लेते हुए नदी से बाहार आ गयी और हम वापस आने लगे। 
इस बार ज्यादा सन्नाटा था, अब वो भी दुखी थी और अपने आपके हारने से ज्यादा मुझे न मना पाने के भारी बोझ के साथ धीरे-धीरे चल रही थी। 
जाते जाते मैंने सिर्फ इतना कहा - अपना ख्याल रखना। 
वो बोली - वो तो तुम रखते हो न?
मैंने भी कह दिया - अब आदत डाल लो, क्योंकि अब मैं नहीं रख पाउँगा। 
उसने मेरा हाथ कसकर थाम लिया और बोली - पक्का ? आँखों में आँखे डालकर कहो..... 
मैं भी उसके पास गया और उसकी आँखों में अपनी आँखों को गडा कर कह दिया - हाँ पक्का, अब थोड़ा व्यस्त रहने लगा हूँ, तुम्हारे लिए समय नहीं निकाल पाउँगा।
वो भी मुस्कुराते हुए बोली -  ठीक है मैं इन्तजार करुँगी तुम्हारी व्यस्तता के खत्म होने तक। और तुम बस मान जाओ, बाकी मुझे फांसी भी मंजूर..... 
इतना कहते ही उसकी आँखों से आंसू निकल ही आये..... 
मैंने उसका हाथ झटका और अपने रस्ते चलने लगा, मेरी धड़कने भी तेज थी, आँखे लाल हो रही थी कि उसको मैं किस बात की सजा दे रहा हूँ। 
जब की संसार में वही तो है जो मुझे मेरे जीवन की तृष्णा को शांत करने में सम्बल देती है। आज भी मेरी अस्थिर परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठाने में प्रोत्साहित कर रही है। मगर मैं भी निर्णय ले चूका था अब नहीं......... 
इतने वो दौड़ती हुयी मेरे पास आई और बोली - संसार में काबिल बनने की प्रतिस्पर्धा में ये मत भूल जाना की प्रेम में कोई पात्रता नहीं होती। तुम खुस रहो चाहे जहां रहो बस यही महत्त्वपूर्ण है। समझे...... 
मैंने भी कह दिया - सब समझता हूँ तुम्हारी चिकनी चुपड़ी बाते बस हम कभी नहीं मिलेंगे, अब तुम जाओ.........
वो भी बोल दी - ठीक है नहीं मिलेंगे और मुस्कुराते हुए बोली अब तो मान जाओ............

और इस तरह मेरी कविता हवाओं के साथ मेरे हाथो से रेत की तरह फिसलते हुए कहीं गम हो गयी......... 

Tuesday, 29 March 2016

चिंतन........

बड़ी मज़ेदार बात है न कि हम अपनी जीवन का 80 प्रतिशत समय केवल चिंतन करने में व्यर्थ कर देते हैं। जबकि हम सबको पता है
चिंता ऐसी दाकिनि, काट कलेजा खाये
वैद्य बेचारा क्या करे, कहाँ तक दवा लगाए
अर्थात कबीर जी ने कहा है की इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। सब कुछ क्षणभंगुर की तरह कभी भी नष्ट हो सकता है। फिर भी हम चिंता करके स्वयं को, अपने समय को व्यासरथ करते हैं। अरे 80 प्रतिशत यदि जीवन में आप 25 प्रतिशत भी सदुपयोग कर ले तो बाकी 55 प्रतिशत अपने आप बच जायेगा चिंतन से।
आप खुद सोचिये की क्या कभी सोचने से कोई कार्य सिद्ध हुआ है?
मुझे तो नहीं लगता
वैसे भी 95 प्रतिशत लोगो का तो यही मानना है न
कि सब कुछ जो कुछ भी घट रहा है
पूर्व-निर्धारित पूर्व-नियोजित है
तो फिर चिंतन व्यर्थ ही हुआ न
जीवन में जब सब कुछ पहले से ही तय है तो सोच-सोच कर अपना समय क्यों नष्ट कर रहे हैं
मैं ऐसा नहीं मानता
मेरे विचार और मेरा मत बिलकुल विपरीत है इस सन्दर्भ में
मेरा मानना है
नियति एक छलावा है
स्वयं को और स्वयं की असमर्थताओं को ढंकने का
क्यूंकि हम चिंतन करके ये निर्धारित करते हैं
कि
काश ऐसा हुआ होता
काश ऐसा कर लेते
सब पता था फिर भी गलती हो गई
इत्यादि.........
वरन
ऐसा नहीं है
हम असक्षम थे
परिस्थितयो को भांप नहीं पाये
उनके अनुकूल अपने आपको तत्पर प्रस्तुत नहीं कर पाए
और इसको स्वीकार करने की जगह हम चिंतन से शुरू करते हैं
दूसरों को अपनी असमर्थताओं के लिए जिम्मेदार ठहराने का दौर
मगर ये सच है
चिंतन सिर्फ एक छलावा है
जो ये साबित करता है
कि आपमें कार्य करने लायक प्रतिभा नहीं है, आपकी मनः स्थिति आपको हर क्षण मानने के लिए प्रेरित करती है
इसलिए अपने जीवन के बहुमूल्य 80 प्रतिशत समय को बचाते हुए
चिंतन से दूर रहे....
नियति पर आश्रित न रहे
नियति का निर्माण करे
क्यूंकि
जो बीत गया
वो आप चाहे कितने भी प्रयत्न कर ले
पर उसको बदल नहीं सकते
जो आप बदल सकते हैं
वो है आने वाला समय
किन्तु उसके लिए भी आपको
आज का सृजन नीतिपूर्वक करना होगा.........

Monday, 21 March 2016

अलविदा Facebook...


हाय फेसबुक
26/12/2010
हाँ यही वो तारीख है
जब पहली बार
तुमसे मेरा सामना हुआ था
दीपक ने ही तुमसे रूबरू होकर
तुम्हे अपनाने की सलाह दी थी
वरना
मैं तो Orkut में ही बहुत खुश था
मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ
की तुमने मुझे एक
ज़रिया दिया
अपनी बात लोगों तक पहुचाने का
देर-सबेर अपनों से जुड़ने का
Thank You
उन दिनों मैं Sagar में था
जब तुम्हारा क्रेज़ चरम पर था
तब school friends को सर्च करना
मेरी पहली priority थी
धीरे धीरे मैं तुम में रम गया
और तुम्हारा हो गया
दिनभर स्टेटस डालना
राजनीति, धर्म और शोषण को
उजागर करने और लड़ने का
जैसे बीड़ा ले रखा हो
हफ्ते में 3-4 बार
Profile Picture चेंज करना
जैसे आम बात थी
मुझे आज भी याद है
BME का पेपर था
और मैंने लगातार
तुम्हारे साथ 28 घंटे बिताये थे
ये सब तो बहुत पुरानी बाते हैं
मगर तुमसे बहुत सारी यादें जुडी हैं
जैसे राहतगढ़ की Dust-Bin वाली Photo
wo रोज़ रोज़ का मुझे ब्लॉक करवा देना
सब तुम्हारी चाल थी न??
जनता हूँ मैं
मेरी साड़ी poems
भले बिना सर-पैर की होती थी
तुमने हमेशा उसे दूसरों को सुनाया है
Thanx
मगर Facebook
बीते कुछ दिनों तुमने
एक और एहसास कराया
एक सच
की तुम
तुम नहीं हो
बहुत उलझन में था उस दिन
जब तुम्हारे पास आया था
मगर तुम
जो की सिर्फ एक
छलावा हो
इस दुनिया के दर्द से दूर भागने का
उस दिन भी बस
मुझे दिलासा दे रहे थे
कि
मैं अपनी उलझनों को प्रदर्शित कर दूँ
मगर
मैं औरो की तरह
तुम्हारे इस N/W में 
हाँ-हाँ जाल में
फसने वाला नहीं
समझे न
तुम एक झूठ हो
जिसे सब अपनाना चाहते हैं
क्यूंकि सबको पता है
वास्तविकता बहुत भयावह
और अराजक सी है
और तुम्हारा काल्पनिक संसार
उन्हें कुछ पलो का
सुकून देता है
एक उम्मीद देता है
एक खुसी देता है
मगर सब झूठ
अरे
तुम्हारा वजूद
और अस्तित्व ही क्या
जो मुझे जानते हैं
वो जानते हैं
की तुमसे बड़ा झूठ हूँ मैं
अरे लोग तो
मुझे pinch करके चेक करते हैं
की मैं हूँ भी या नहीं
तो फिर
इसलिए मैं जा रहा हूँ
हमेशा हमेशा के लिए
तुमसे दूर
झूठ से दूर
कल्पनाओं और भ्रम से दूर
एक सच के लिए
जहाँ
मुझसे नफरत करने वाले
मेरी आँखों में आँखे डालकर
कह सकेंगे
तुम बहुत बड़े चूतिया हो
उन्हें तुम्हारे कारण
झूठ नहीं बोलना पड़ेगा
जहा
मुझे तुम्हारे
notification का आदि नहीं होना पड़ेगा
अपनों का जन्मदिन याद रखने के लिए
मैंने समझ लिया
डूबने के बाद ही सही
की इंतज़ार करना बेकार है
यदि आग है
तो अंदर है
तुम सिर्फ छलावा हो
ढोंग हो
एक झूठ हो
दुआ करना मुलाक़ात न हो
क्योंकि हुयी
तो फिर तुम्हे मेरी जरुरत होगी
मुझे तुम्हारी नहीं
bye bye
अलविदा Facebook...
                                              -अभिषेक (King Of Hearts)

Saturday, 19 March 2016

अजीब बँटवारा...........


धरती को खंड-खंड करके 
कई हिस्सों में बाँट दिया 
कुछ हमने रखा 
कुछ आपने ले लिया 
मेरी धरती पे 
हरियाली बहुत है 
और 
आपकी पे केसर 
मेरी धरती पे 
उमीदो की रौशनी बहुत है 
और आपकी पे 
ख़ामोशी की ठंडक 
आपकी धरती पे 
जब बरसात होती है 
तो कीचड होता  है??
लोग कहते हैं 
हमारे यहाँ नहीं होता 
मेरी धरती पे 
सूरज ज्यादा रौशनी करता है 
सुना है 
आपसे तो
वो बहुत चिढ़ता है 
हवा भी
भेद-भाव करती होगी आपसे 
हमारे यहाँ
बहुत ज्यादा बहती है क्यूंकि 
पता नहीं 
और क्या क्या अंतर है 
आपकी और मेरी धरती में 
मगर 
मेरी धरती पे 
रहने वाले 
आदमी नहीं 
आदमखोर हैं 
ठीक आपकी धरती के 
लोगों की तरह 
जिन्हें अपने स्वार्थ के लिए 
मैंने 
कभी राजनीति का 
तो 
कभी धर्म का 
चोला पहने 
आदमियों का 
उनकी संवेदनाओं का 
और उनकी परिस्थितियों का 
भक्षण कर रहे हैं 
धरती को विभाजित हुए 
वर्षों हो गए 
अब तो ये आदमखोर 
बस इसके आदमियों के 
टुकड़े कर रहे हैं............
                                                    -आक्रोशित कवि (अभिषेक) 

Friday, 18 March 2016

प्रतिबिम्ब........

यूँ तो
सब कुछ मेरा ही है
मगर फिर भी
सब अधूरा है आपके बिना
जब पहली दफा देखा था
तो लगा था
मैं ही हूँ
बस लिबास और ज़ेहन बदल गया हो
बाकी एहसास और अंदाज़ वही था
विचारो की क्रांति
हर बार इतनी आकर्षित नहीं करती मुझे
मगर
आपकी कशिश इतनी ग़ज़ब की थी
की
आपका फितूर मुझे
आपका शागिर्द बना गया
वो हौसला
वो इरादे
वो बेहतरीन मुस्कान
वो जीने की कला
वो सकारात्मक सोच
वो आँखों का ग़ज़ब का नूर
पता भी नहीं चला
कब शिद्दत से
मेरी ख्वाहिशो में आप आ गए
यदि मौका मिला
बदलने का ज़िन्दगी को
तो आप बनना चाहूंगा
क्यूंकि
मैंने देखा है
महसूस किया है
आंसुओ को पीकर मुस्कुराना
आसान नहीं होता
और फिर तो आपके आंसू
आज भी
जलजला हैं मेरे लिए
मुझे मालूम है
की आपको इल्म भी नहीं है
न ही एहतेराम है
की परदे में
हसरतो का तूफ़ान है
नहीं पता मुझे
की ये कैसी ख्वाहिश है
मगर
मेरे कलेजे का टुकड़ा
जब भी चमकेगा
तो आपकी तरह ही चमकेगा
आपकी तरह ही चहकेगा
और आपकी तरह ही
सारी फिज़ाओ में महकेगा
और वैसे भी
मैं तो इस फुलवारी के
माली का मुरीद हो गया हूँ
जो ऐसा फूल
दुनिया को दिया है
उनकी दी हुयी खाद
उनका सींचा हुआ प्यार
इस फूल की १-१ पंखुड़ी में
साफ़ साफ़ झलकता है
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता
की आँखों और लफ्ज़ो से
आप मौन हैं
कई अरसे से
मगर
जनता हूँ
कितना दर्द पीते
हर एक सांस के बाद वादा है मेरा
क्यूंकि
दर्पण को देखकर
ये अश्क कहते हैं
या तो आप मेरा प्रतिबिम्ब हो
या फिर मैं आपका
प्रतिबिम्ब........
                                                                   -सिरफिरा कवि (अभिषेक)

Saturday, 12 March 2016

मेरा गुरूर..........

वाह
हवाओ की ठंडक से
ऐसा लगा
जैसे फिर
मेरा गुरूर लौट आया हो
जिसे मैं
हर पल
हर लम्हे में
याद करता हूँ
मेरी आँखों का
जैसे वो नूर लौट आया हो..
न जाने कब उसकी पलकों को
मैंने अपना बनाया था
कब उसके दर्द
अपनी साँसों में उतारे थे
उसकी न रुकने वाली हँसीं
हमेशा हँसीं न होती थी
बल्कि इस बात का इल्म कराना
की मैं तड़प रही हूँ
झुलस रहा हूँ
इस आग में
मेरा गुरूर
कि
उसकी हंसी को लौटा लाऊंगा
धुंधला पड़ गया था
उसे
जो हँसीं में
ख्वाबो की रौशनी में
कुछ नज़र आने लगा था
न जाने क्या पाने की होड़ में
मेरा गुरूर तोड़ कर
चली गयी
आज
इस मौसम के साथ
पहली बार जब उसके
रुखसारों के लालिमा को
याद करता हूँ
तो बहुत याद आता है
उस मौसम का
मेरा गुरूर..........
                                                       -सिरफिरा कवि (अभिषेक)