Wednesday, 9 March 2016

एक और रत्न...

याद आता है
आषाढ़ का एक दिन
जब मैं शकुंतला के साथ
अंधे युग को पार कर
मधुशाला जाया करता था
जहाँ
कदम के पेड़ के नीचे
अविरल बसंती हवाओं के बीच
कामायनी 
मेरा इन्तेजार करती थी
हमेशा
इस पार से उस पार
पहुँचते
मेरे कदम ठहर जाया करते थे
और उस रेशमी नगर में
मुझसे पुछा करते थे
चाँद का कुर्ता
कहाँ छोड़ आये तुम
जो गीतांजलि ने तुम्हें
नये बचपन की
सौगात पे दिया था 
दूर का सितारा
मुझे बार-बार कोसता है
कि
तुम आधे हो अधूरे हो
क्योंकि वो मेघदूतों से
विनती कर रही है
तुम्हारे लौट आने का
किसी तरह
जो ग़ज़लों में उलझी हुई है
मीर की...
उसे अभी भी
मुक्तिबोध के यथार्थ से
भय लगता है
आज भी पाश उसके लिए
अबूझ पहेली ही है
और तुम हो कि
उसके पल्लू में
न जाने कितने जुलूस
का बोझा बाँध आये हो
और उसने उसे
मीरा की तरह
विष नहीं अमृत मानकर पी लिया है
जिस के कारण
उसका मैला आँचल भी
कोणार्क की तरह
कनुप्रिया सा मधुर
महसूस हो रहा है
वो गोदो के इंतज़ार में
कहीं यथार्थवाद को
असंगत न समझ बैठे
वो भी कहीं मृत्युंजय की भाँती
कालजयी न हो जाये
इसलिए मल्लिका के ईवर
लौट चलो
इस पागल लड़की के दीवानेपन से दूर
पाश्मीने की रातों में...
जहाँ आधी रात के बाद
एक साधु कहानी सुनाता है
पॉपकॉर्न खाते हुए
एक अशुद्ध बेवक़ूफ़ की
तिरछी रेखाओं से गुदी
अपनी डायरी को पढ़कर....................................
                                                                         -सिरफिरा कवि ( अभिषेक)

Tuesday, 8 March 2016

आखरी मोहब्बत.........

ज़माने गुजरे
जब इबादत की पहल
हसीन हुआ करती थी
तब तो जैसे हवायें भी
हमारी मुस्कुराहटों की
मोहताज हुआ करती थी
अब
सब कुछ बदल गया था
जैसे
सारे अरमान
किसी बंजर ज़मीन में
काँटों की झाड़ियो सा सूख रहे थे
एक नीरसता
मेरे ह्रदय के साथ मेरे विचारो को भी
धीरे धीरे खोखला कर रही थी
तब उस रोज़
हर सुबह की भाँती
एक नयी सुबह हुयी
एक उम्मीद लिए फिर
हर रोज़ की तरह
साइकिल से निकल पड़ा
की तभी
भीड़ को चीरता हुआ
कुछ अजीब सी चमक लिए
एक मादक मुस्कान के साथ
एक चेहरा
शायद मासूमियत का पर्याय
मेरी चक्षुओ को भेदता
सीधे दिल में उतरता सा बगल से निकला
कुछ पल का ये टकराव
मुझे जैसे घायल सा कर गया
उसके इत्र की खुसबू
जैसे रोम-रोम में भर गयी
उसकी खत्म न होने  वाली मुस्कान
बादलो सी
जैसे धरती की प्यास बुझाने आतुर
मेरे रुखसारों की ज़मीन पे छा गए
जिसके गुरुत्वाकर्षण से
अचानक उस रोज़ जैसे रुकी हुई
मेरी रुह की इबादत
का नूर फिर से जगमगाने लगा
तब जाना की चेहरों की चमक
ही काफी है जीने के लिए
खुश रहने के लिए
यदि वो चेहरा कोई नाम न मांगे
किसी रिश्ते की बागडोर न मांगे
तो बिना शर्त के
जिंदगी नवीन और अमर हो जाती है...
शायद वही था
मेरी आखरी मोहब्बत का
पहला मंज़र.......
                                                    -सिरफिरा कवि (अभिषेक)

Saturday, 5 March 2016

हादसा



न जाने किन शब्दों में 
अपना हाल बयां करूँ 
आंसूओं के सिवा 
आँखों को और दिल को 
कुछ सूझता ही नहीं 
कुछ महीनो पहले 
जब मुझे चंद कागज़ के 
टुकड़े मिले थे 
मेरी व्यावसायिक कार्य की 
पहली किश्त के रूप में 
उस रोज़ 
बड़ा विचलित हुआ था 
असमंजस था 
के क्या करूँगा इनका 
जिनका मेरे अस्तित्व में 
मृगमरीचिका जितना  योगदान है 
फिर एक तरकीब सूझी 
जिसके तहत 
कई रातो तक सोया नहीं 
कुछ नया और अपना सा 
करने की ख्वाहिश लिए 
एक कोशिश की 
सारी भावनाओं को 
शब्द दिए 
मोती जैसे एक एक याद को 
माला में पिरोया 
और फिर 
उसे एक लिफाफे में 
बंद कर के भिजवा दिया 
सोचा खुद जाऊँ 
अपने हाथ से अर्ज़ी दूँ 
मगर 
इतनी तड़प थी कि 
रुक न पाया 
और सबको चौकाने 
खुस करने के बहाने उसे पोस्ट कर दिया 
एक माह बीता 
बड़े संघर्षो के बाद 
वो आज पंहुचा 
इंडिया पोस्ट के सौजन्य से 
मगर 
ये क्या 
सारे अरमान ऐसे टूटे 
जैसे शरीर से रूह निचोड़ ली हो किसी ने 
किसी ने आँखों के अंदर तक जाकर 
खून भर दिया हो 
सिसकियो में मेरे 
सिर्फ दर्द को ऐसे घोल दिया हो 
जैसे एक पक्षी के पंख उखाड़ दिए हो 
लिफाफो की जगह 
निकले 
सिर्फ newspaper के टुकड़े 
जो मैंने नहीं भेजे थे..........
                                                    -टूटा-फूटा कवि(अभिषेक)

Tuesday, 23 February 2016

मेरा आखरी सफर.....


देखना दोस्तों 
उस दिन क्या नजारा होगा 
जब सड़कों से गुज़र रहा 
जनजा हमारा होगा 
भीड़ लगेगी हर उस शख़्स की 
जो कभी न कभी रहा हमें प्यारा होगा 
जो आज हमसे पर्दा कर 
रूठा बैठा है 
कई कोषों दूर 
उसका भी उस दिन 
एक कंधे का सहारा होगा 
खूब सुन लिए बहाने जीते जी 
पर उस दिन न आने का कोई भी बहन 
हमें न गवारा होगा।
होठो पे मुस्कान लिए 
सबको खुश रखने की कोशिश की जीते जी
आँखों में उस दिन उन्ही के
दरिया का कारन बनूँगा मैं 
हमेशा साहिल ढूँढा दूसरों को पार लगाने 
लेकिन 
आज मेरा ही न कोई किनारा होगा। 
पीछे छोड़ 
एक घर मेरा,
जिसमे है मेरे माँ-बाप,
जिनके ख्वाब और ख्वाहिशो का चिराग मुझसे था। 
एक परिवार,
जिसकी आस-विश्वास और प्रयास मुझसे थे। 
एक स्कूल का पुराना बस्ता, जिसमे है दोस्तों की यादें 
कुछ कॉलेज की डायरियाँ 
जिसमे है आइना मेरा 
एक रंगमंच की कहानी भी है 
जो अधूरी छोड़ कर जा रहा हूँ दूसरी बार 
कुछ रिश्ते 
जिनकी ख़ुशी के लिए शायद कुछ सेकंड और रुकने का मन था मेरा 
घड़ियों का कलेक्शन की शायद समय को बाँध पाऊँ 
चाबी के छले की शायद हर मुस्कान की चाबी हो मेरे पास एक दिन 
कुछ कंचे, कुछ लम्हों की हसरते 
और एक लैपटॉप और हार्डडिस्क 
शायद जो मौत के बाद दूसरा सच है मेरा 
हालांकि 
ये सब तो कहीं न कहीं धूमिल हो भी जायेगा 
पर क्या कोई मिटा पायेगा मुझे इनकी हसरतो से 
इनकी यादो, इनकी लकीरों, इनकी मोहबत्तों,
और इनकी इबादत से 
कुछ मीठी नफरतो से 
अब तो शरीर भी ढीला पद गया है 
कान-नाक में रुई लगा दी है 
आँख भी बंद करके लेता हूँ 
रुखसत हो गयी है मेरी 
फिर भी हसरत किये जा रहा हूँ 
कि 
हर कोई चाहिए मुझे मेरे आखरी सफर में 
जिसने मेरी जिंदगी में मुझे संवरा होगा 
पता है मुझे 
मम्मीजी मुझसे लिपट के चिल्लाएँगी- उठ जा न!!! अब कभी नहीं डाटूंगी, नहीं लड़ूंगी अब... 
पापाजी हमेशा की तरह आज भी आाँखों में आंसू भरे किनारे खड़े होंगे 
पगली, पूजा बोलेगी उठो न भाईसाहब इस दूज पे भी मई ही पैसे दूंगी, राखी पे भी 
आज लाड करने के लिए 
मेरी जान, मेरे भाईसाहब तो होंगे 
मुझे लोरी सुनाने 
पर आज मई लम्बी नींद में सो चूका होऊंगा 
सभी रिश्तेदार आज भी मेरी कमी महसूस कर रहे होंगे 
भाई-बहिन के मन में सामना करने की भी न हिम्मत होगी 
और बड़ी मुश्किल से अपॉइंटमेंट्स कैंसिल करके आये,
मोबाइल साइलेंट किये खड़े हुए, 
घडी देखते दोस्तों को 
आज भी मेरी मौत मेरी एक नौटंकी लग रही होगी। 
और जल्दी जाने का मन, वही पुराण उनका बहाना  होगा। 
फूलो से खेल हमेशा, भँवरे की तरह,
आज उन्ही फूलों के नीचे दबकर जाना मुझे हरगिज़ मंजूर नहीं 
मैंने जो पंख हमेशा फ़ैलाये रखे 
उनको ढांक कर ले जाने मैं मजबूर नहीं 
मगर अब मेरी चेतना जड़ हो गयी है 
मई मूर्त से गश्त खाकर,
धरा में समाने जा रहा हूँ 
या शायद जलकर वायु में घुलने जा रहा हूँ 
जहाँ 
क्षितिज की सी रौशनी बराबर मई भी 
सूरज की किरणों सा आखरी बार जगमगाऊंगा.... 
ये मेरा आखरी सफर है 
जिसमे आज न कोई मेरी बुराई करता मुझे नजर आएगा,
क्यूँकि आज तो बस सबकी जुबान पे नाम हमारा होगा।।
न दुश्मन, न दोस्त, न घर, न परिवार, न कोई रिश्ता, न संसार,
जो ज़िन्दगी भर न हो पाया हमारा,
जाते जाते उसके दिल में बसेरा आखरी हमारा होगा 
तो हम चलते हैं 
आखरी सफर में अपने....... 
जहा न कुछ हमारा, न कुछ तुम्हारा होगा....... 
अलविदा............. 
                                                                                          - सिरफिरा कवि (अभिषेक )

Lion Of Thoughts: ख्वाब..

Lion Of Thoughts: ख्वाब..: एक चेहरा मासूम सा अपनी आँखों में लाखों सवाल लिए परेशान करता है मुझे हर रात मेरे ख़्वाब में वो ख़्वाब जो हक़ीकत से ज्यादा हसीन है वो अ...

ख्वाब..

एक चेहरा
मासूम सा
अपनी आँखों में
लाखों सवाल लिए
परेशान करता है मुझे
हर रात मेरे ख़्वाब में
वो ख़्वाब
जो हक़ीकत से ज्यादा
हसीन है
वो अक्स और उसकी शख्शियत
मेरे लिए
मेरी रूह की पहचान सी है
मगर
उसके लिए
मई एक कल्पना का सागर हूँ
जिसकी गहराई
अथाह नहीं
वरन
अगाध है
उसकी आँखों में जब जब मेरी आँखे ठहर  हैं
ऐसा मालूम होता है
की उसका दर्द मेरी साँसों में समां सा रहा हो
और उसकी चित्कार
मेरे कानो में ऐसे गूँज रही हैं
जैसे
कोई नादान
खिलौने की
ख्वाहिश लिए
मेरी ओर
टकटकी लगाये
बड़ी आस से
बस घूरे जा रहा हो
अपने अधूरे ख्वाब के लिए...... 

Wednesday, 11 June 2014

Wajood - khatre me

kal raat 1 toofan aaya,
jisne mjhe,
mere wajood ko,
ahko ko mere
bouna thehraya,
tha kaapta raha mai
samne usk dono hatho ko jod
magar wo toofan,
bawandar bankar,
sunami ki tarah mujh par hi tharraya..
tha kasoor itna ki
apni imaandari ka maara raha main
jndgi bhar sbse
sbhi k liye haara mai
q na jane
har shaks k liye tha mera man b khilona ek..
na jane kaise sare viphal ho gaye
karya, sampoorn mere anek
mai hara hu,
kamjor hu
toot b gaya hu
shayad sada k liye
magar mai bujdil ni..
tha galat to rokna to chahiye tha
tha ghranit to tokna to chahiye tha
mere wajood ko khatre me na daalkar
mjhse bolna to chahiye tha
hu mai b layak is jamane me bolne ka hak liye..
fir b sabne khamosh saja di mujhe tadapne k liye..
tootkar bikharne k liye..
aaj fir aakhri baar hai
mera wajood khatre me..