Saturday, 17 September 2016

वो खो गयी कहीं


कुछ रोज़ पहले
वो खुश थी बहुत
जैसे किसी शहज़ादी को
नगीना तराश कर पहनाया गया हो
महकती थी
साँसे भी उसकी
जैसे
मन के कोनों में
बगीचा लगाया हो
एक कशिश थी
उसके हर झूठे सच में
फ़नाह हो जाती थीं
फ़िज़ायें भी
उसके झूठे रस्क में
बेतरतीब जुनून था
उसकी अदायगी में
खो जाता था हर ज़र्रा
उसके ही नूर में
ख्वाहिशें तमाम उसकी
हसरत से बड़ी होती थीं
पर पसंद था अंदाज़ मुझको
उसका यूँ ख़ुद को
रवां करना
हर ख्वाहिश के लिए
उसका बिखर जाना
तवज्ज़ो ख़ुद की
ग़ैर से भी नीचे तगलीक करना
याद है अब भी मुझे
उसका मेरे लिए खुद को
रूह से बेवफ़ा करना
अब
वो दूर है
कोषों मुझसे
मग़र उसकी इबादत नहीं कम है
टूटकर बिखरे मोती सा
उसके और भी कद्रदान हैं अब तो
पर
नाफ़रमान शुरुआत उसकी
खुश नहीं रखती उसको
जानता हूँ
अब बेग़ैरत हूँ उसके लिए
जैसे नहीं होश रहता
साकी को जामो का
वैसे वो भी अब
अनजान है मेरे पैगामो से
मगर मुस्कुराहटों से
आज भी
उसकी कमियां दिखती हैं मुझे
आज भी उसे सच से डर लगता है
शायद अब भी
वो अंधेरो को पसंद करती है
उसको अब भी
रौशनी के बेफिक्राना होने का अंदाज़ 
नहीं अच्छा लगता शायद
वो खो गयी कहीं
जिसे मैं जानता और मानता था
क्योंकि
उड़ना सीख जाने से
इंसान परिंदा नहीं हो जाता
तुम सच को छुपा सकते हो
ऐ मेरे सित परों की शहज़ादी
मगर झुठला नहीं सकते
अफ़सोस ये नहीं
कि तेरा अक्स भी महरूम है मुझसे
तेरी झूठी हंसी
बनावटी दुनिया तेरी
मुझे बौना सा करती है
जो हाथ थाम मेरा
अंधेरों से बाहर आयी थी
वो खो गयी कहीं
वो खो गयी कहीं

------------------------------------------------------------------- तेरी ख़ुशी के इंतजार में.........

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