ये जो बाह्य संसार के,
मेरे आरोप हैं
भटकती, विस्मित
अराजकता के स्रोत हैं
सब छल हैं
मेरे ह्रदय की
कल्पनाओं से ग्रसित
विक्षिप्त मनः स्थिति
के पूरक हैं
अराजक कुछ भी नहीं
इस मधुरम संसार में
सभी कुछ मनोरम है
रमणीय है
मेरे अंतर्मन को छोड़ कर
जिस व्यवस्था को
अराजकता का दर्जा देकर
मैं गौरवान्वित सा
अपने वक्ष को चौड़ा महसूस करता रहा
वो भी एक मिथ्या की छाया है
क्योंकि
इस व्यवस्था के प्रतिफल
मेरा अस्तित्व विद्यमान है
तो फिर
इस प्रवाह में गतिमान नौका के
रिसने का कारण क्या है
इस ऊमस पूर्ण पवन के
द्रवित कणों का
साधन क्या है
अगर सब शुष्क है तो
ये छिद्र जिससे नौका दोषारोपित है
ये मेरे
हाँ मेरे
अंतर्मन द्वारा ही रोपित है
स्वयं को उज्जवल, स्वच्छ
वस्त्रों से ढांक
अन्य के वस्त्रों को रंगने से
कुछ भी सहिष्णु नहीं हो जायेगा
सत्य को कोई नहीं परिवर्तित कर सकता
हाँ
उसको आंतरिक और व्यावहारिक
दाबों के माध्यम से
ओझल किया सकता है
मगर सत्य
सत्य रहता है
और सत्य के भय से
अराजकता का जन्म होता है
एक
अद्भुत अराजकता का
............................................................................. to be continued
स्वयं की एक आख़री खोज
वो भी स्वयं में ..........
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