Friday, 9 September 2016

अंतहीन अराजकता

सत्य के भय से
अराजकता का जन्म होता है
एक
अद्भुत अराजकता का
ये
वही है
जो कर्म को विभाजित करती है
खंड खंड करती है
दृढ़ निश्चय को
जो विचारों के सागर को
दूषित कर
नीर विहीन कर
पंक द्रव्य से परिपोषित कर देती है
जब ह्रदय
स्वयं को
प्रवाहित संसार के घाट पर
असमर्थ मान लेता है
प्रतिभाओं को
क्षमताओं को
अनेकों
कोशिषो को
निरर्थक मान लेता है

तब प्रारम्भ होती है
अराजक प्रतिक्रियाएं 

मेरी पराजय को ढंकने हेतु
आरम्भ होता है
दोषारोपण
एवं
प्रतिहास
उस व्यवस्था का
जो सब कुछ सही चलने तक सही थी
किन्तु
एक
क्षणिक विद्रोह से
विषयान्तर हो
गलत की श्रेणी में आ गयी

ये जो घटनाएं
अचानक से अप्रिय सी प्रतीत होती हैं
उसकी वजह कोई व्यवस्था नहीं
अपितु
मेरी स्वयं की
व्यावहारिक एवं मानसिक
अव्यवस्थायें हैं
जो
पराजय स्वीकार करने में असमर्थ हैं
और इसलिए अराजक है

और अपना बोध कराने हेतु
हिंसक
निरर्थक
अनैतिक
क्रिया कलापो में व्यस्त हैं

जिस से मूल कारण का निदान न हो
काल्पनिक तथ्यों का निर्माण हो

और मेरी खोखली साख बनी रहे
ये अराजकता
जो अद्भुत है
और विद्यमान है
मेरे ह्रदय से लेकर
मेरे हर रोमकूप में

ये अराजकता मुझे विशिष्ट रूप से
धरा के बहुत नीचे तक धकेलती जा रही है
और एक दिन
मेरी काया
ये सारी माया
एक छलावे की तरह
क्षणभंगुर की भांति
वायु में लुप्त हो जाएगी
तब अस्तित्व रह जायेगा तो केवल
इस
अंतहीन अराजकता का

जो हमारे अंदर हमें अलग करके रखती है
हमारे सत्य से
हमारे संकल्प से
हमारे विश्वास से
हमारी प्रयासरत रहने की तीव्र
महत्वकांक्षाओं से
क्योंकि
हम भी
स्वयं से अधिक
दूसरों के स्वप्न को महत्त्व देते हैं
तो
जो हमारा है
वो तो हो ही जायेगा न
किसी दुसरे की उपस्थिति में
असुरक्षित और
अराजक।।


.............................................................................
स्वयं की एक आख़री खोज
वो भी स्वयं में ..........

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