वाह
हवाओ की ठंडक से
ऐसा लगा
जैसे फिर
मेरा गुरूर लौट आया हो
जिसे मैं
हर पल
हर लम्हे में
याद करता हूँ
मेरी आँखों का
जैसे वो नूर लौट आया हो..
न जाने कब उसकी पलकों को
मैंने अपना बनाया था
कब उसके दर्द
अपनी साँसों में उतारे थे
उसकी न रुकने वाली हँसीं
हमेशा हँसीं न होती थी
बल्कि इस बात का इल्म कराना
की मैं तड़प रही हूँ
झुलस रहा हूँ
इस आग में
मेरा गुरूर
कि
उसकी हंसी को लौटा लाऊंगा
धुंधला पड़ गया था
उसे
जो हँसीं में
ख्वाबो की रौशनी में
कुछ नज़र आने लगा था
न जाने क्या पाने की होड़ में
मेरा गुरूर तोड़ कर
चली गयी
आज
इस मौसम के साथ
पहली बार जब उसके
रुखसारों के लालिमा को
याद करता हूँ
तो बहुत याद आता है
उस मौसम का
मेरा गुरूर..........
-सिरफिरा कवि (अभिषेक)
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