Tuesday, 8 March 2016

आखरी मोहब्बत.........

ज़माने गुजरे
जब इबादत की पहल
हसीन हुआ करती थी
तब तो जैसे हवायें भी
हमारी मुस्कुराहटों की
मोहताज हुआ करती थी
अब
सब कुछ बदल गया था
जैसे
सारे अरमान
किसी बंजर ज़मीन में
काँटों की झाड़ियो सा सूख रहे थे
एक नीरसता
मेरे ह्रदय के साथ मेरे विचारो को भी
धीरे धीरे खोखला कर रही थी
तब उस रोज़
हर सुबह की भाँती
एक नयी सुबह हुयी
एक उम्मीद लिए फिर
हर रोज़ की तरह
साइकिल से निकल पड़ा
की तभी
भीड़ को चीरता हुआ
कुछ अजीब सी चमक लिए
एक मादक मुस्कान के साथ
एक चेहरा
शायद मासूमियत का पर्याय
मेरी चक्षुओ को भेदता
सीधे दिल में उतरता सा बगल से निकला
कुछ पल का ये टकराव
मुझे जैसे घायल सा कर गया
उसके इत्र की खुसबू
जैसे रोम-रोम में भर गयी
उसकी खत्म न होने  वाली मुस्कान
बादलो सी
जैसे धरती की प्यास बुझाने आतुर
मेरे रुखसारों की ज़मीन पे छा गए
जिसके गुरुत्वाकर्षण से
अचानक उस रोज़ जैसे रुकी हुई
मेरी रुह की इबादत
का नूर फिर से जगमगाने लगा
तब जाना की चेहरों की चमक
ही काफी है जीने के लिए
खुश रहने के लिए
यदि वो चेहरा कोई नाम न मांगे
किसी रिश्ते की बागडोर न मांगे
तो बिना शर्त के
जिंदगी नवीन और अमर हो जाती है...
शायद वही था
मेरी आखरी मोहब्बत का
पहला मंज़र.......
                                                    -सिरफिरा कवि (अभिषेक)

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