Monday, 5 September 2016

"अराजकता"

"अराजकता"

मैं सोचता था
ये मेरे चारों ओर
जो विद्यमान है
जो प्रश्न हैं
अनुभूतियाँ हैं
सब अराजक ही तो हैं
सारी व्यवस्थाएं
सारे लोग
सारी सुविधाएं
सारे भोग
सृष्टि का कण-कण
अम्बर की साड़ी वायु
सब कुछ अराजक ही तो है
क्योंकि
किसी भी पाषाण ह्रदय के पास
मेरे कल्पित
मासूम सी कुंठित
और विचलित आशंकाओं का
समाधान जो नहीं था
ये भी कोई व्यवस्था है
जहाँ हर रिश्ते में मतलब है
उम्र ढलने का प्रतीक्षा करती आँखों में
मृत्यु की अविरल स्वीकारोक्ति है
जहाँ प्रत्येक क्षण घुट कर मरते हुए
अनगिनत वादे हैं

ये व्यवस्था अपेक्षाओं से शुरू होकर
व्यापार में तब्दील हो जाती है
ये भी कोई व्यवस्था है
अराजकता है ये
भरोषे की
जो एक
मानवीय मानसिक विकृति से
ग्रसित हो
शिकायत करती है
अपनी ही कल्पनाओ से रचित
उस मायावी संसार की
जो उसे
सिर्फ दिलासा देता है
कि ये भी ढल जायेगा कल की भाँति
ये क्या है
अराजकता ही तो है
ये था मेरा असहिष्णु ज्ञान
जो अज्ञानता के प्रकाश से ओट-प्रोत हो
हावी था मुझ पर
एक अद्भुत
अदम्य भूचाल के आने से पहले तक
किन्तु अब
अब सत्य प्रत्यक्ष प्रदर्शित हो चुका है
अपने कोमल और बाल्य रूप में
निश्छल
निर्मोही
और
निर्भीक
............................................................................. to be continued
स्वयं की एक आख़री खोज
वो भी स्वयं में ..........

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