कुछ पहेलियाँ बुझाइए
आइए कि आज आप
हमसे भी नज़रें मिलाइए,
जो कह रहे हैं लोग
महफिलों में यहाँ
कान में आकर सही
सच तो हमें बताइये,
हम नहीं वाम अंग,
ना ही कोई भगवा रंग
हम तो रहे हैं अनंत से
सिर्फ एक तेरे संग
उस प्रसंग की कसम
आइए अब सनम
गुनगुना के कुछ सही
कोई धुन नई बनाइये
ये अथक सफर ख़त्म
ये बहाने अब नहीं
आप हैं सुदृढ़ता धनी
ये बैसाखियाँ हटाइये
नहीं रहेगी पश्चिमी
कोई हवा साथ में
नहीं रहेगा कोई धनी
करवटों के बाद में
फिर ये नग्न दमडियों
चिलचिलाती धूप में
खोलकर ये अंगरखा
तन ढाँककर दिखाइए
मैं अज्ञानी अबोध सा
भटक रहा यहाँ-वहाँ
कुछ देर पास आइए
दुनियादारी सिखाइये
दूर से ना यूँ मुस्कुराइए
कुछ पहेलियाँ बुझाइए
आइए कि आज आप
हमसे भी नज़रें मिलाइए।
उत्साही
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