Saturday, 15 May 2021

अधूरी किताब

कुछ अनकहे शब्दों से लिपटी,
मैं एक अधूरी किताब हूँ,
जिसके पन्ने-पन्ने उधड़े पड़े हैं,
ऐसी जिल्द में मैं बेहिसाब हूँ,
कोरे पन्नों में उथला-सा दर्द लिए,
कोटि गुलाबों की खुशबू समेटे,
बंद कई राज़ मुड़े हुए,
आख़री पन्नों में दबाकर बैठी,
मैं धधकते आँसुओं का
हर जागती रात का हिसाब हूँ,
जो ना मित सके कभी,
वो फ़ैसले फासलों के
लेकर भी लाजवाब हूँ,
कुछ अनकहे शब्दों से लिपटी,
मैं एक अधूरी किताब हूँ।

उत्साही

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